
कभी पढ़ते पढ़ते हुये सो गए थें
कभी पढ़ते पढ़ते हुये सो गए थें
सो इल्म-ओ-हुनर से परे हो गए थें
पढ़ाते थें उस्ताद तारीख़ कल की
हसीं कल के हम ख़्वाब में खो गए थें
बुरी आदतों का बुरा है नतीजा
हँसे पहले फिर बाद में रो गए थें
उमूर कच्ची में हिफ़्ज़ होता है पक्का
समझ थी नहीं बारहवीं को गए थें
सुधरने का मौक़ा नहीं होता ढीला
कमर कस के तैयार हम हो गए थें
ख़ुशी में भी बहते हैं ग़म में भी आँसू
कि अंजाम-ए-मेहनत पे हम रो गए थें
ये जग पूजता उगते सूरज को राशिद
समझदार हम डूब कर हो गए थें
मोहम्मद राशिद इक़बाल
सितंबर 13, 1996 शुक्रवार
डालटनगंज